महाभारत

महाभारत में ये खास बाते कर्ण को एक सच्चा मित्र और महान योद्धा बनाती हैं

महाभारत के बारे में हम बचपन से सुनते आए है। महाकाव्य जो महाभारत से प्रसिद्ध है। यह सबसे बड़ा साहित्य ग्रन्थ है। महाभारत को एक धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ कहा जाता है। महाभारत के प्रमुख पात्रो में से एक पात्र महान योद्धा ‘कर्ण’ का है। कर्ण की वास्तविक माँ कुंती थी। महाभारत में कर्ण दुर्योधन का सबसे अच्छा मित्र था। वो महाभारत युद्ध में अपने भाई पांडवो के विरुद्ध लड़ा था। कर्ण सूर्य का पुत्र था। कर्ण को दानवीर कर्ण माना जाता है। उनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिलता है। उनके काम से हमें जीवन जीने की कला और रिश्ते निभाने का हुनर सीखने को मिलता है। तो आइए जानते उनके चरित्र से हमें क्या सिख मिलती है।

सबसे बड़ा धर्म है

दान कर्ण को दानवीर कर्ण कहा जाता है, क्योंकि जब दान की बात आती है, तो उसके द्वार से कोई खाली हाथ नहीं जाता था चाहे वो कोई भी हो। इसका उल्लेख महाभारत में है। जब युद्ध से पहले इंद्र भिक्षुक का वेश लेकर कर्ण से कवच और कुण्डल मांगा, तो उसने बिना किसी हिचकिचाहट के कवच और कुण्डल दान में दे दिए। यह जानना कि उन्हें युद्ध में उतारना कितना कठिन होगा। कर्णने अपने जीवन को अपने चारों ओर के लोगों को दे दिया इतना ही नहीं परंतु जब अंत में जब वह मर रहा था तब भी कर्ण ने अपनी दानवीरता का परिचय दिया। हालांकि कर्ण जब अपनी अंतिम सांस ले रहे थे उस वक़्त दो ब्राह्मणों ने सूर्योदय के आसपास उनके पास आए और उन्हें दान के लिए कहा। उस वक़्त कर्ण ने असहाय महसूस किया क्योंकि उसके पास कुछ भी नहीं बचा था और वह अपनी मौत के नजदीक था। तब कर्ण ने अपने दो दांतों को तोड़ दिया जिसमें कुछ सोना था और ब्राह्मणों को दिया था।

महाभारत

वचन का महत्व

महाभारत के प्रमुख पात्रो में से एक पात्र महान योद्धा ‘कर्ण’ का है। कर्ण सबसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व में से एक है। जब युद्ध होने वाला था, भगवान कृष्ण ने कर्ण से कहा कि अगर वह पांडवों का साथ दे और उनकी तरफ से युद्ध लड़ेंगे, तो उन्हें पूरा राज्य दिया जाएगा। कर्ण ने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसने अपने मित्र दुर्योधन के साथ रहकर उनकी तरफ से युद्ध करने का वादा किया था।और श्री कृष्ण से मिले प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने अपने वचन के माध्यम से संदेश दिया कि व्यक्ति को वचनबद्ध होने के महत्व को समझना चाहिए।

आदर्श मित्र का उदाहरण

जब माता कुंतीने कर्ण को उसे उसकी वास्तविक पहचान का ज्ञान कराया और कहा की वह उनका पुत्र है और और ज्येष्ठ पाण्डव है। आप पांडवों के बड़े भाई हैं, तो आपको भाई के खिलाफ नहीं लड़ना चाहिए। कुन्ती उसे कहती हैं कि वह पाण्डवों की ओर हो जाए। कर्णने कहा अब कोई भी परिवर्तन के लिए बहुत देर हो चुकी है। क्योकि कि दुर्योधन उसका मित्र है, और उस पर बहुत विश्वास करता है और वह उसके विश्वास को धोखा नहीं दे सकता। कर्ण ने कहा आपके पाँच बेटे है और केवल पाँच ही रहेंगे। इस वजह से उनकी दोस्ती को आज भी याद किया जाता है। कर्ण ने महाभारत के माध्यम से संदेश दिया है कि मित्र को कभी धोखा नहीं देना चाहिए।

पढ़े: श्रीमद् भागवत गीता में भगवान कृष्ण ने बताए निर्णय लेने के ये तरीके

Leave a Comment